"जिनमे अकेले चलने का हौसला होता है,एक दिन उसके पिछे ही काफ़िले होते हैं।""सिर्फ दुनिया के सामने जीतनेवाला ही "विजेता" नहीं होता,किन "रिश्तों" के सामने कबऔर कहाँ पर "हारना" है,यह जानने वाला भी विजेता होता है।""जबरदस्ती मत मांगना ज़िन्दगीमें किसी का साथ,जो खुद चलकर आये उसकीखुशी ही कुछ और होती है।""कभी कभी लगता है कि,हिम्मत जवाब दे रही है, और हौसला टूट रहा है,लेकिन फिर मन से एक आवाज निकलती है,कि ऐसे कैसे,तुम्हारे हौसले पर तो और भी लोगों की हिम्मत और हौसला टिका हुआ हैं।"
Sunday, 7 June 2020
आज का सुविचार
Saturday, 6 June 2020
Jokes
मैं तेरा फुफा.
एक चिड़ियाघर मेंएक तोते के पिंजरे के बाहर लिखा थाEnglish, हिंदी और Haryanvi बोलने वाला तोताएक आदमी ने इस बात को टेस्ट करने के लिए तोते से पहले ENGLISH में पूछा --हू आर यू ?तोता -- आई ऍम पैरेटआदमी (हिंदी में) -- तुम कौन हो?तोता -- मैं एक तोता हूँआदमी (इस बार Haryanvi में)-- तूं कूण स रैतोता -- मैं तेरा फुफा..दो बार बता लीया समझ ना आता के..😂😂😜😜😁😁
पत्नि अपने पति से : "जी, मैं आपके दिल में रहना चाहती हूं ।"पति : " ठीक है । पर वहाँ दूसरी औरतों से लड़ना मत ।"पत्नि....बेहौश...🙂😃😜
संता: डॉक्टर साहब.. मैं चश्मा लगाकर पढ़ तो सकूंगा न?डॉक्टर: हाँ हाँ बिल्कुल।संता: थैन्क यू डॉक्टर साहब आपने अनपढ़ आदमी की जिंदगी बना दी।😝😝😎😎
Friday, 5 June 2020
मछुआरों की समस्या........
मछलियाँ सालों से जापानियों की प्रिय खाद्य पदार्थ रही हैं. वे इसे अपने भोजन का एक अभिन्न अंग मानते हैं. ताज़ी मछलियों का स्वाद उन्हें बहुत पसंद हैं. लेकिन तटों पर मछलियों के अभाव के कारण मछुआरों को समुद्र के बीच जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं.
शुरुवाती दिनों में जब मछुआरे मछलियाँ पकड़ने बीच समुद्र में जाते, तो वापस आते-आते बहुत देर हो जाती और मछलियाँ बासी हो जाती. यह उनके लिए एक बड़ी समस्या बन गई क्योंकि लोग बासी मछलियाँ ख़रीदने से कतराते थे.
इस समस्या का निराकरण मछुआरों ने अपनी बोट में फ्रीज़र लगवाकर किया. वे मछलियाँ पकड़ने के बाद उन्हें फ्रीज़र में डाल देते थे. इससे मछलियाँ लंबे समय तक ताज़ी बनी रहती थी. लेकिन लोगों ने फ्रीज़र में रखी मछलियों का स्वाद पहचान लिया. वे ताज़ी मछलियों की तरह स्वादिष्ट नहीं लगती थी. लोग उन्हें ख़ास पसंद नहीं करते थे और ख़रीदना नहीं चाहते थे.
मछुआरों के मध्य इस समस्या का हल निकालने के किये फिर से सोच-विचार की प्रक्रिया प्रारंभ हुई. आख़िरकार इसका हल भी मिल गया. सभी मछुआरों ने अपनी बोट में फिश टैंक बनवा लिया. मछलियाँ पकड़ने के बाद वे उन्हें पानी से भरे फिश टैंक में डाल देते. इस तरह वे ताज़ी मछलियाँ बाज़ार तक लाने लगे. लेकिन इसमें भी एक समस्या आ खड़ी हुई.
फिश टैंक में मछलियाँ कुछ देर तक इधर-उधर विचरण करती. लेकिन ज्यादा जगह न होने के कारण कुछ देर बाद स्थिर हो जाती. मछुआरे जब किनारे तक पहुँचते, तो वे सांस तो ले रही होती थी. लेकिन समुद्री जल में स्वतंत्र विचरण करने वाली मछलियों वाला स्वाद उनमें नहीं होता था. लोग चखकर ये अंतर कर लेते थे.
ये मछुआरों के लिए फिर से परेशानी का सबब बन गई. इतनी कोशिश करने के बाद भी समस्या का कोई स्थाई हल नहीं निकल पा रहा था.
फिर से उनकी बैठक हुई और सोच-विचार प्रारंभ हुआ. सोच-विचार कर जो हल निकाला गया, उसके अनुसार मछुआरों ने मछलियाँ पकड़कर फिश टैंक में डालना जारी रखा. लेकिन साथ में उन्होंने एक छोटी शार्क मछली भी टैंक में डालनी शुरू कर दी.
शार्क मछलियाँ कुछ मछलियों को मारकर खा जाती थी. इस तरह कुछ हानि मछुआरों को ज़रूर होती थी. लेकिन जो मछलियाँ किनारे तक पहुँचती थी, उनमें स्फूर्ती और ताजगी बनी रहती थी. ऐसा शार्क मछली के कारण होता था. क्योंकि शार्क मछली के डर से मछलियाँ पूरे समय अपनी जान बचाने सावधान और चौकन्नी रहती थी. इस तरह टैंक में रहने के बाबजूद वे ताज़ी रहती थीं.
इस तरकीब से जापानी मछुआरों ने अपनी समस्या का समाधान कर लिया.
मित्रों, जब तक हमारी जिंदगी में शार्क रूपी चुनौतियाँ नहीं आती, हमारा जीवन टैंक में पड़ी मछलियों की तरह ही होता है – बेजान और नीरस. हम सांस तो ले रही होते हैं, लेकिन हममें जिंदादिली नहीं होती. हम बस एक ही रूटीन से बंध कर रह जाते हैं. धीरे-धीरे हम इसके इतने आदी हो जाते हैं कि चुनौतियाँ आने पर बड़ी जल्दी उसके सामने दम तोड़ देते हैं या हार मान जाते हैं. धीरे-धीरे चुनौतियों और मेहनत के डर से हम बड़े सपने देखना छोड़ देते हैं और हालातों से समझौता कर साधारण जीवन व्यतीत करने लगते हैं. यदि जीवन में बड़ी और असाधारण सफ़लता हासिल करनी है, तो बड़े सपने देखने होंगें. सपनों को वास्तविकता में परिवर्तित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को तैयार करना होगा. तब ही बड़ी और असाधारण सफ़लता की प्राप्ति होगी.
🇲oтιvαтιoηαℓ 🇹нoυgнт
जब कोई “हाथ” और “साथ”
दोनों ही छोड़ देता है,
तब “कुदरत” कोई न कोई
उंगली पकड़ने वाला भेज देती है,
इसी का नाम “जिदंगी” है...!!
मुस्कुरा कर चलते रहिए..!!
सहयोग एक बहुत ही महंगी चीज़ है,
इसकी हर किसी से उम्मीद न रखे
क्योकि,
बहुत ही कम लोग दिल के अमीर होते हैं ..!!
“आसमां को झुकाने हम चले है,
नई बुलंदियों को पाने हम चले है।
है भरोसा मुझे खुद पर
यूं ही नही तुफानो से बाजी लगाने हम चले है।
हो सफर कितना भी मुश्किल, क्या फरक है,
मेरे इरादे भी उस पंछी की तरह कड़क है
जिसके ऊपर आसमां, नीचे जमीं है,
लेकिन उसके विश्वास में कहा कमी है।
उस पंछी की तरह पर फैलाने हम चले है,
जिंदगी के नए गीत गाने हम चले है।
आसमां को झुकाने हम चले है,
नई बुलंदियों को पाने हम चले है।”
हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी
हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी ,
पहला चरण - कैंची
दूसरा चरण - डंडा
तीसरा चरण - गद्दी ...
तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे.
*तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।*
*"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*।
और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* ।
*आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था*।
हमने ना जाने कितने दफे अपने *घुटने और मुंह तोड़वाए है* और गज़ब की बात ये है कि *तब दर्द भी नही होता था,* गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।
अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और *अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में* ।
मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी! *"जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं* ।
*इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए* !
और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।
और ये भी सच है की *हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी* ।
हम लोग की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !
*पहला चरण कैंची*
*दूसरा चरण डंडा*
*तीसरा चरण गद्दी।*
● *हम वो आखरी पीढ़ी हैं*, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और नावेल पढ़े हैं।
● *हम वही पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है।
● *हम निश्चित ही वो आखिर लोग हैं*, जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो और बिनाका जैसे प्रोग्राम सुने हैं।
● *हम ही वो आखिर लोग हैं*, जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे। वो सब दौर बीत गया। चादरें अब नहीं बिछा करतीं। डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए। अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं। *हम ही वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है...!!*
*हम एक मात्र वह पीढी है* जिसने अपने माँ-बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे है.
ये पोस्ट जिंदगी का एक आदर्श स्मरणीय पलों को दर्शाती है |
Subscribe to:
Posts (Atom)
Online earning ke tarike
Freelancing : Aap apne skills ke hisab se online freelancing kar sakte hai. Jaise ki content writing, graphic de...
